Sunday, 8 December 2013
Friday, 6 December 2013
shri niwas gadhyam
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| aacharya |
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| shri shriniwaas swami . |
श्रीमदखिलमहीमण्डलमण्डनधरणीधर मण्डलाखण्डलस्य, निखिलसुरासुरवन्दित वराहक्षेत्र विभूषणस्य, शेषाचल गरुडाचल सिंहाचल वृषभाचल नारायणाचलाञ्जनाचलादि शिखरिमालाकुलस्य, नाथमुख बोधनिधिवीथिगुणसाभरण सत्त्वनिधि तत्त्वनिधि भक्तिगुणपूर्ण श्रीशैलपूर्ण गुणवशंवद परमपुरुषकृपापूर विभ्रमदतुङ्गशृङ्ग गलद्गगनगङ्गासमालिङ्गितस्य, सीमातिग गुण रामानुजमुनि नामाङ्कित बहु भूमाश्रय सुरधामालय वनरामायत वनसीमापरिवृत विशङ्कटतट निरन्तर विजृम्भित भक्तिरस निर्घरानन्तार्याहार्य प्रस्रवणधारापूर विभ्रमद सलिलभरभरित महातटाक मण्डितस्य, कलिकर्दम मलमर्दन कलितोद्यम विलसद्यम नियमादिम मुनिगणनिषेव्यमाण प्रत्यक्षीभवन्निजसलिल समज्जन नमज्जन निखिलपापनाशना पापनाशन तीर्थाध्यासितस्य, मुरारिसेवक जरादिपीडित निरार्तिजीवन निराश भूसुर वरातिसुन्दर सुराङ्गनारति कराङ्गसौष्ठव कुमारताकृति कुमारतारक समापनोदय दनूनपातक महापदामय विहापनोदित सकलभुवन विदित कुमारधाराभिधान तीर्थाधिष्ठितस्य, धरणितल गतसकल हतकलिल शुभसलिल गतबहुल विविधमल हतिचतुर रुचिरतर विलोकनमात्र विदलित विविध महापातक स्वामिपुष्करिणी समेतस्य, बहुसङ्कट नरकावट पतदुत्कट कलिकङ्कट कलुषोद्भट जनपातक विनिपातक रुचिनाटक करहाटक कलशाहृत कमलारत शुभमञ्जन जलसज्जन भरभरित निजदुरित हतिनिरत जनसतत निरस्तनिरर्गल पेपीयमान सलिल सम्भृत विशङ्कट कटाहतीर्थ विभूषितस्य, एवमादिम भूरिमञ्जिम सर्वपातक गर्वहापक सिन्धुडम्बर हारिशम्बर विविधविपुल पुण्यतीर्थनिवह निवासस्य, श्रीमतो वेङ्कटाचलस्य शिखरशेखरमहाकल्पशाखी, खर्वीभवदति गर्वीकृत गुरुमेर्वीशगिरि मुखोर्वीधर कुलदर्वीकर दयितोर्वीधर शिखरोर्वी सतत सदूर्वीकृति चरणघन गर्वचर्वणनिपुण तनुकिरणमसृणित गिरिशिखर शेखरतरुनिकर तिमिरः, वाणीपतिशर्वाणी दयितेन्द्राणिश्वर मुख नाणीयोरसवेणी निभशुभवाणी नुतमहिमाणी य स्तन कोणी भवदखिल भुवनभवनोदरः, वैमानिकगुरु भूमाधिक गुण रामानुज कृतधामाकर करधामारि दरललामाच्छकनक दामायित निजरामालय नवकिसलयमय तोरणमालायित वनमालाधरः, कालाम्बुद मालानिभ नीलालक जालावृत बालाब्ज सलीलामल फालाङ्कसमूलामृत धाराद्वयावधीरण धीरललिततर विशदतर घन घनसार मयोर्ध्वपुण्ड्र रेखाद्वयरुचिरः, सुविकस्वर दलभास्वर कमलोदर गतमेदुर नवकेसर ततिभासुर परिपिञ्जर कनकाम्बर कलितादर ललितोदर तदालम्ब जम्भरिपु मणिस्तम्भ गम्भीरिमदम्भस्तम्भ समुज्जृम्भमाण पीवरोरुयुगल तदालम्ब पृथुल कदली मुकुल मदहरणजङ्घाल जङ्घायुगलः, नव्यदल भव्यमल पीतमल शोणिमलसन्मृदुल सत्किसलयाश्रुजलकारि बल शोणतल पदकमल निजाश्रय बलबन्दीकृत शरदिन्दुमण्डली विभ्रमदादभ्र शुभ्र पुनर्भवाधिष्ठिताङ्गुलीगाढ निपीडित पद्मावनः, जानुतलावधि लम्ब विडम्बित वारण शुण्डादण्ड विजृम्भित नीलमणिमय कल्पकशाखा विभ्रमदायि मृणाललतायित समुज्ज्वलतर कनकवलय वेल्लितैकतर बाहुदण्डयुगलः, युगपदुदित कोटि खरकर हिमकर मण्डल जाज्वल्यमान सुदर्शन पाञ्चजन्य समुत्तुङ्गित शृङ्गापर बाहुयुगलः, अभिनवशाण समुत्तेजित महामहा नीलखण्ड मदखण्डन निपुण नवीन परितप्त कार्तस्वर कवचित महनीय पृथुल सालग्राम परम्परा गुम्भित नाभिमण्डल पर्यन्त लम्बमान प्रालम्बदीप्ति समालम्बित विशाल वक्षःस्थलः, गङ्गाझर तुङ्गाकृति भङ्गावलि भङ्गावह सौधावलि बाधावह धारानिभ हारावलि दूराहत गेहान्तर मोहावह महिम मसृणित महातिमिरः, पिङ्गाकृति भृङ्गार निभाङ्गार दलाङ्गामल निष्कासित दुष्कार्यघ निष्कावलि दीपप्रभ नीपच्छवि तापप्रद कनकमालिका पिशङ्गित सर्वाङ्गः, नवदलित दलवलित मृदुललित कमलतति मदविहति चतुरतर पृथुलतर सरसतर कनकसरमय रुचिरकण्ठिका कमनीयकण्ठः, वाताशनाधिपति शयन कमन परिचरण रतिसमेताखिल फणधरतति मतिकरवर कनकमय नागाभरण परिवीताखिलाङ्गा वगमित शयन भूताहिराज जातातिशयः, रविकोटी परिपाटी धरकोटी रवराटी कितवीटी रसधाटी धरमणिगणकिरण विसरण सततविधुत तिमिरमोह गार्भगेहः, अपरिमित विविधभुवन भरिताखण्ड ब्रह्माण्डमण्डल पिचण्डिलः, आर्यधुर्यानन्तार्य पवित्र खनित्रपात पात्रीकृत निजचुबुक गतव्रणकिण विभूषण वहनसूचित श्रितजन वत्सलतातिशयः, मड्डुडिण्डिम ढमरु जर्घर काहली पटहावली मृदुमद्दलादि मृदङ्ग दुन्दुभि ढक्किकामुख हृद्य वाद्यक मधुरमङ्गल नादमेदुर नाटारभि भूपाल बिलहरि मायामालव गौल असावेरी सावेरी शुद्धसावेरी देवगान्धारी धन्यासी बेगड हिन्दुस्तानी कापी तोडि नाटकुरुञ्जी श्रीराग सहन अठाण सारङ्गी दर्बारु पन्तुवराली वराली कल्याणी भूरिकल्याणी यमुनाकल्याणी हुशेनी जञ्झोठी कौमारी कन्नड खरहरप्रिया कलहंस नादनामक्रिया मुखारी तोडी पुन्नागवराली काम्भोजी भैरवी यदुकुलकाम्भोजी आनन्दभैरवी शङ्कराभरण मोहन रेगुप्ती सौराष्ट्री नीलाम्बरी गुणक्रिया मेघगर्जनी हंसध्वनि शोकवराली मध्यमावती जेञ्जुरुटी सुरटी द्विजावन्ती मलयाम्बरी कापीपरशु धनासिरी देशिकतोडी आहिरी वसन्तगौली सन्तु केदारगौल कनकाङ्गी रत्नाङ्गी गानमूर्ती वनस्पती वाचस्पती दानवती मानरूपी सेनापती हनुमत्तोडी धेनुका नाटकप्रिया कोकिलप्रिया रूपवती गायकप्रिया वकुलाभरण चक्रवाक सूर्यकान्त हाटकाम्बरी झङ्कारध्वनी नटभैरवी कीरवाणी हरिकाम्भोदी धीरशङ्कराभरण नागानन्दिनी यागप्रियादि विसृमर सरस गानरुचिर सन्तत सन्तन्यमान नित्योत्सव पक्षोत्सव मासोत्सव संवत्सरोत्सवादि विविधोत्सव कृतानन्दः श्रीमदानन्दनिलय विमानवासः, सतत पद्मालया पदपद्मरेणु सञ्चितवक्षस्तल पटवासः, श्रीश्रीनिवासः सुप्रसन्नो विजयतां. श्रीअलर्मेल्मङ्गा नायिकासमेतः श्रीश्रीनिवास स्वामी सुप्रीतः सुप्रसन्नो वरदो भूत्वा, पवन पाटली पालाश बिल्व पुन्नाग चूत कदली चन्दन चम्पक मञ्जुल मन्दार हिञ्जुलादि तिलक मातुलुङ्ग नारिकेल क्रौञ्चाशोक माधूकामलक हिन्दुक नागकेतक पूर्णकुन्द पूर्णगन्ध रस कन्द वन वञ्जुल खर्जूर साल कोविदार हिन्ताल पनस विकट वैकसवरुण तरुघमरण विचुलङ्काश्वत्थ यक्ष वसुध वर्माध मन्त्रिणी तिन्त्रिणी बोध न्यग्रोध घटवटल जम्बूमतल्ली वीरतचुल्ली वसति वासती जीवनी पोषणी प्रमुख निखिल सन्दोह तमाल माला महित विराजमान चषक मयूर हंस भारद्वाज कोकिल चक्रवाक कपोत गरुड नारायण नानाविध पक्षिजाति समूह ब्रह्म क्षत्रिय वैश्य शूद्र नानाजात्युद्भव देवता निर्माण माणिक्य वज्र वैढूर्य गोमेधिक पुष्यराग पद्मरागेन्द्र नील प्रवालमौक्तिक स्फटिक हेम रत्नखचित धगद्धगायमान रथ गज तुरग पदाति सेना समूह भेरी मद्दल मुरवक झल्लरी शङ्ख काहल नृत्यगीत तालवाद्य कुम्भवाद्य पञ्चमुखवाद्य अहमीमार्गन्नटीवाद्य किटिकुन्तलवाद्य सुरटीचौण्डोवाद्य तिमिलकवितालवाद्य तक्कराग्रवाद्य घण्टाताडन ब्रह्मताल समताल कोट्टरीताल ढक्करीताल एक्काल धारावाद्य पटहकांस्यवाद्य भरतनाट्यालङ्कार किन्नेर किम्पुरुष रुद्रवीणा मुखवीणा वायुवीणा तुम्बुरुवीणा गान्धर्ववीणा नारदवीणा स्वरमण्डल रावणहस्तवीणास्तक्रियालङ्क्रियालङ्कृतानेकविधवाद्य वापीकूपतटाकादि गङ्गायमुना रेवावरुणा
शोणनदीशोभनदी सुवर्णमुखी वेगवती वेत्रवती क्षीरनदी बाहुनदी गरुडनदी कावेरी ताम्रपर्णी प्रमुखाः महापुण्यनद्यः सजलतीर्थैः सहोभयकूलङ्गत सदाप्रवाह ऋग्यजुस्सामाथर्वण वेदशास्त्रेतिहास पुराण सकलविद्याघोष भानुकोटिप्रकाश चन्द्रकोटि समान नित्यकल्याण परम्परोत्तरोत्तराभिवृद्धिर्भूयादिति भवन्तो महान्तोज़्नुगृह्णन्तु, ब्रह्मण्यो राजा धार्मिकोज़्स्तु, देशोयं निरुपद्रवोज़्स्तु, सर्वे साधुजनास्सुखिनो विलसन्तु, समस्तसन्मङ्गलानि सन्तु, उत्तरोत्तराभिवृद्धिरस्तु, सकलकल्याण समृद्धिरस्तु
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jai shriman narayan
SHARANAGATI - THE INDISPENSABLE NECESSIYT OF THE TRUE DEVOTEES
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| SHRI TRIDANDI SWAMIJI MAHARAJ |
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sharanagati ki visheshata-

1) Sharanagati sakal fhal denevali hai.
2) Sabhi koi shanagati ke adhikari hai
3) Sabhi desh, sabhi kaal, kisi bhi avashta mein sharanagati ki ja sakati hai.
4)Sharanagati jeevan mein ek hi baar karani padati hai
5) Sharanagati anaayaas saadhya hai.
6) Sharanagati anaayaas saadhya hone par bhi dusari drushti se vichaar karane par kathin siddh hoti hai. isa mein maha vishwas avashyak hai.
7) Sharanagati bhramashtra ke samaan prabhaav rakati hai.
sharanagati n kisi paap se nasht ho sakati hai n koi paap hi sharanagati se milane vale fhal mein prathiband daal sakata hai.
9) Sharanagati shri bhagawadgita kaa pradhan pratipadhya vishay hai
10) Sharanagati uttam sadhan hai, sharanagati ke samaan dusara koi shresht sadhan sansar main hai hee nahee.
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| saranagati |
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jai shriman narayanpandit shridhar mishra
Thursday, 5 December 2013
WHAT IS DO BE HOLD - IS THE RELIGION
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| SHRI LAKSHMI VENKATESH DEVASTHANAM(BHAKTI VATIKA ,DEORIA) |
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What is eligible to be hold ,is the religion. Caste & creed are the part of the religion, not the religion.
Just like the religion of fire is to burn, Water’s religion is to provide coolness , Man’s religion is to serve.To follow the Constitution is also the religion. Only worship is not called the religion, Religion is eternal.
It is not understandable that peoples advocates for the Secular (Dharma Nirpeksha) India. How to live being an absolute secular ? How wise is to call India an absolute secular? India’s religion & creed should be secular. A religious person can be a leader rather than a secular.
Whoever came to India from time to time in ancient times , whether they Hun, Shak, Khus, Varvar, Pulkas, Aabhir, Kank, Yavan whatever, India’s Sanatan Dharma adopted everyone, this is the generosity of the eternal religion because religion is eternal.
The history of India is Sri Ramayan and Mahabharata. If you've seen today
Popular history , it is the story of destructors ( Aakantraon).All ancient history of India
Is to respect the power, seeing the God in all the powers.In Sanatana Dharma , How everything is being worshipped is described, e.g. how to worship River, mountains, waterfalls, animals, birds etc. Even the venomous snakes are also worshipped in India.
Now if we consider, where someone is left, whom we can hate?
India eternal strength is Full of faith and is lyrical, Sanatana Dharma, the eternal religion will remain.Protector of Sanatan Dharma will lead here. "
"Jai Srimannarayana!
Srimatey Ramanujay Namah!"
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| JAGADGURU RAMANUJACHARYA SHRI RAJNARAYANACHARYA SWAMIJI MAHARAJ |
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Jagadguru Ramanujacharya Swami Rajnarayanacharya
Sri Laxmi Venkateshwara DevasthanamBhakti vatika
Deoria
Thursday, 28 November 2013
HOMAGE TO SHRI TRIDANDI DEV SAMADHI ASTHAL
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| SHRI VIGRAH OF SHRI TRIDANDI SWAMIJI MAHARAJ AT SAMADHI STHAL |
HOMAGE TO SAMADHI ASTHAL
o pious samadhisthal ! o shri tridandi deo dhaam ! how one poor ignorant and incapable can describe your glory ? becuse at sidhaashram (buxar) this is the unique place of gravitation for innumerable mortals fed upon the milk o kindness of a motherly acharya .with an emerged magnificient temple with the fitness of south indian style a unique trinity is completed having self revealed lord lakshminarayan at one corner – lord vaikunthnath at the secound corner and samadhi temple of pujay pad anant shribhushit tridandi swamiji maharaj at third corner ..
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| SAMADHI STHAL |
unequal in purity unparallelleled in history – it will remain unequal till the earth survives as herein rests the life of lives, heart o hearts , a kaya or vigrah of religion itself . here is a scene, powerfullto melt any heart . beside the samadhiasthal, the ganga full of sobbing is flowing slowly echoing sorrow and sadness over deprivation of a long run company of a saint – whose boldness of character is as the himalayas devotion as deep as the pacific ocean, kindnesscooler than the soothing moon light ,. tapashya brighter than the sunshine , teeja more dazzling than the fire flames , forgiveness having its own desing , matching that of mother sitajee alone .
o samadhiasthal ! yours are fortunate enough as you shall sparkle with the rays of pujyapad shri swamiji maharaj for ever
you are our saptapuri and dham of dharma . i am bowed in revernce to you
JAI SHRIMAN NARAYAN
DASANUDAS
क्या लिखो मुझे नही पता , कहा से लिखो यह समझ नही आरहा है , by shridhar mishra
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| mere gurudev jagadacharya shri tridandi swamiji maharaj |
क्या लिखो मुझे नही पता , कहा से लिखो यह समझ नही आरहा है ,
आज से करीब तेरह साल पहले दास के गुरुदेव और वैष्णव कुल दिवाकर जगदाचार्य श्री त्रिदंडी स्वामीजी महाराज का वैकुण्ठ वास दिनांक :२/१२/१९९९ को सुबह ९ बजे गुरूवार के दिन हो गया था ।
आज भी जब वो समय याद आता है तो क्या करो क्या कहो किस्से कहो कुछ समझ नही आता । शब्द कोष के शब्द कम पड जाते है, शब्द मुझे कोसने लगते है और कहते है कि अरे मुर्ख हमारे अंदर इतना समर्थ नही है जो उनके जीवन चरित्रामृत कि व्याख्या कर सके और लेखनी काम करना बंद कर देती है और डाटती है कि मेरे अंदर इतना बल नही है कि उनकी अनंत जीवन चरित्रामृत को लिख सको। तो बुद्धि विवेक कम करना बंद कर देते है और फिर एक चीज रेह जाती है और जिस्के कारण यह साँसे चल रहे है वो कषायम यगसूत्रम् का अनुशंधान।
आइये कुछ अपनी सोच आपके सामने रखता हु :
सोचता था कि क्या पता स्वामीजी के परमपद होनेके बाद यह पापो से युक्त शारीर कैसे चलेगा ?
सोचता था कि अब कौन है जो बिना कहे हे मेरी सारी समश्याओं का समाधान कर देगा
सोचता था कि कौन अब हम जैसे पतिको के पाप को आपने नेत्रो से रंच मात्र देख कर हर लेगा
सोचता था कि अब कैसे जग मग जग मग कि गुंजारमय धवनि से भूमण्डल पवित्र होगा
सोचता था कि अब किस्को सस्टांग परणाम करूँगा
अब उन यतिराज का दर्शन कैसे होगा
परन्तु इतना सोचने के बाद मुझे अपने आप से द्वेष हो गया कि मै कितना मुर्ख हु , कि इतना सा नही समझ सका कि स्वामीजी का पंचतत्वों से बना शारीर हे पंचतत्वों मे विलीन हुआ है श्री स्वामीजी महाराज तो आज भी दास के वक्ष गुहा मेंविराज मान हृदये में विराजमान है।
मेंकितना मुर्ख था कि यह सोच लिए क्युकी स्वामीजी महराज आज भी अपने सारे भक्तो को उसी प्रकार दर्शन देते है समाधी स्थल इसका प्रमाण है। समाधी स्थल में स्वामीजी कि दिव्यज्योति के दर्शन आज भी होते है और जब तक यह भू देवी का अखंड साम्राजय है तब तक देते रहेंगे।
भक्तजन पूछते है कि स्वामीजी महाराज के उत्तराधिकारी कौन है ?
मेरे मत यह है कि क्या कोई स्वामीजी महाराज का उत्तराधिकारी बनने योग्य है ?? क्या इस धरा धाम पर कोई ऐसा समर्थ रखता है जो उनका उत्तराधिकारी बन सके। .... तो इसका जवाब होगा नही , क्युकी वो महान विभूति थे। इसके लिए उनका स्वम दुबारा अवतार लेना होगा अन्यथा नही।
परन्तु हा स्वामीजी के गुणो के उत्तराधिकारी तो नही परन्तु उत्तराधिकारी जैसे उनके अमोघ बालक अवशय है जैसे :
स्वामी जी के पीठ एवं योग के अधिकारी वैकुण्ठ वासी जगद्गुरु योगिराज श्री देवनायाकचार्य स्वामीजी महाराज (वर्तमान में जगद्गुरु राजगोपालाचार्य त्यागी जी महाराज )
स्वामीजी के विद्या के अधिकार जगतगुरु वासुदेवाचार्य विद्याभास्कर स्वामीजी महाराज
स्वामीजी के भक्ति एवं धर्मप्रचार के अधिकारी जगद्गुरु राजनारायणाचार्य स्वामीजी महाराज
स्वामीजी के वासल्यता ,त्याग के अधिकारी श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामीजी महाराज
स्वामीजी के यज्ञ आदि अनुष्ठान के आचार्य , श्री उमेश प्रसाद उपाध्याय जी
और
आत्मविजातो पुत्रः के सिद्धांत से स्वामीजी के सारे शिष्य मंडली भक्त मंडली उनकी उत्तराधिकारी है। .
स्वामीजी हमारे माध्याम से इस धरा धाम पर है क्युकी वो हमारे पिता थे(गुरु होने के कारण) और हैम उनके संतान।
आज स्वामीजी महाराज की पुण्य तिथि है और नही लिखने का समर्थ है बस एक स्लोक लिख रहा हु
न द्रिष्ठ्स्ते स्वामिन् क्वचिदपि विरामो निजजने |
अकस्मात् किं जातं विरतिरभवत् लोकशरणौ ||
जगद् भ्रामं भ्रामं कुशिकतनयस्याश्रमभुवि |
प्रलीनः संजातः स्जनजगतो दुःखशमनः||
जय श्रीमन्नारायण
स्वामीजी का अमोघ बालक
पंडित श्रीधर मिश्र
दिल्ली
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